आखिर क्यों रावण का भाई कुम्भकर्ण परम ज्ञानी ऋषि होकर भी जीवन भर सोता ही रहा,खुद ही माँगा था वरदान

ये तो सबको पता है की रावण जितना बुद्धिमान इस दुनिया में कोई नहीं था लेकिन क्या आप जानते है रावण का भाई कुम्भकर्ण भी बहुत बलशाली और बुद्धिमान था फिर ऐसी क्या वजह थी की वो सोकर अपनी जिंदगी के दिन काट रहा था। 


जैसा की आप जानते है रामायण की कथा अनुसार रावण के कनिष्ठ भ्राता कुम्भकर्णको ब्र्ह्मा जी का वरदान प्राप्त था की वह छः महीने सोएगा और छः महीन जगेगा. तथा जब रावण को लगा की उसकी सेना अब राम की सेना से युद्ध करने के लिए अपर्याप्त है तो उसने अपने भाई कुम्भकर्ण को उनका नेतृत्व करने के लिए जगाया जिस कार्य के लिए रावण और उसके सेवको को काफी मुश्क्तिल का सामना करना पड़ा। 


 ऐसा कहा जाता है की रावण अपने समय का सर्वाधिक विद्वान और ज्ञानी व्यक्ति है तथा उसके खानदान में एक से बढ़कर एक धुरंधर पड़े थे जिनकी बौद्धिक क्षमता तत्कालीन युग में अतुलनीय थी परन्तु इन में से कुम्भकर्णएक ऐसा व्यक्ति था जिस की कहानी सचमुच में हैरान करने वाली है रामायण में बताया गया है की वह छः महीन सोता था परन्तु आखिर एक परम ज्ञानी ऋषि सोकर अपना जीवन क्यों व्यतीत करेगा। 


कुम्भकर्ण एक वैज्ञानिक था जिसे अपने अत्याधुनिक एवं अकल्पनीय अविष्कारों के शोध के लिए रहस्मयी गुफाओं में जाना पड़ता था मान्यतानुसार रामायण काल में कुम्भकर्ण की प्रयोगशाला किष्किंधा के दक्षिण में एक गुफा में थी जिस में उसने आश्चर्यजनक रूप से एक भारी भरकम प्रयोगशाला का निर्माण किया था। 


महर्षि वाल्मीकि ने अपने ग्रंथ रामायण में कुछ ऐसे दिव्यास्त्रों का नाम लिया है जिनकी विनाश क्षमता बहुत ज्यादा थी शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि ये सभी दिव्यास्त्र कुम्भकर्ण  की महान बुद्धि के परिचायक थे जिन्हें उसने अत्यल्प समय में विकसित किया और रावण ने उनकी सहायता से उस समय के लगभग सभी महान वीरों को परास्त किया पुष्पक विमान का वर्णन भी रामायण में आता है जिसका निर्माण कुम्भकर्ण अपने ज्येष्ठ भ्राता रावण के लिए किया था। 


रामायण में बताया गया है की कुम्भकर्ण छः महीने के लिए सोया करता था और जब वह जागता था तो उसका पूरा दिन भोजन करने और परिवार का हाल-समाचार पूछने में निकल जाता था इस तरह कुम्भकर्ण अपने भ्राता रावण के कार्यो से दूर रहता था कुम्भकर्ण  के राक्षस होने के बावजूद उसने कभी अपने जिंदगी में कोई अधर्म का कार्य नहीं किया था यही कारण था की स्वयं देवऋषि नारद ने उसे तत्वज्ञान दिया था। 

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